1 शमूएल 2:25-35

1 शमूएल 2:25-35 HINCLBSI

यदि एक व्यक्‍ति दूसरे व्यक्‍ति के प्रति अपराध करता है, तो परमेश्‍वर उसके लिए हस्‍तक्षेप करता है। परन्‍तु यदि व्यक्‍ति स्‍वयं प्रभु के प्रति पाप करेगा तो कौन उसकी क्षमा के लिए प्रार्थना कर सकता है?’ पुत्रों ने अपने पिता की बातों पर कान नहीं दिया; क्‍योंकि यह प्रभु की इच्‍छा थी कि वे मर जाएँ। बालक शमूएल बड़ा होता जा रहा था; न केवल कद में, वरन् प्रभु और लोगों की कृपा-दृष्‍टि में भी। एक दिन परमेश्‍वर का एक प्रियजन एली के पास आया। उसने एली से कहा, ‘प्रभु ने यह कहा है: “जब तेरा पितृ-कुल मिस्र देश में फरओ राजाओं का गुलाम था तब मैंने उस पर स्‍वयं को प्रकट किया था। मैंने इस्राएल के सब कुलों में से तेरे पितृ-कुल को चुना था कि वह मेरा पुरोहित बने, मेरी वेदी के निकट आए, सुगंधित धूप-द्रव्‍य जलाए, और मेरे एपोद को वहन करे। जो अग्‍नि-बलि इस्राएली मुझे चढ़ाते थे, वह सब मैं तेरे पितृ-कुल को दे देता था। तब तू क्‍यों मेरी बलि और भेंटों को, जिनको चढ़ाने की आज्ञा मैंने इस्राएलियों को दी है, लोलुप दृष्‍टि से देखता है? तू अपने पुत्रों को मुझसे अधिक आदरणीय समझता है जिससे वे मेरे इस्राएली लोगों की प्रत्‍येक भेंट का सर्वोत्तम अंश खाकर स्‍वयं को पुष्‍ट करें?” इसलिए इस्राएल के प्रभु परमेश्‍वर की यह घोषणा है: “यद्यपि मैंने निस्‍सन्‍देह यह कहा था कि तेरा पितृ-कुल सदा मेरे सम्‍मुख रह कर मेरी सेवा करेगा, और मेरा कृपा-पात्र बनेगा, तथापि अब मुझ-प्रभु की यह गंभीर घोषणा है: मेरी यह बात मुझ से दूर हो! मैं अपने आदर करने वालों का आदर करूँगा, और मुझे तुच्‍छ समझने वालों को तुच्‍छ समझूँगा। देख वे दिन आ रहे हैं, जब मैं तेरी संतति को, तेरे पितृ-कुल के आधार-स्‍तम्‍भ को तोड़ दूँगा। फलत: तेरे परिवार में वृद्ध पुरुष नहीं रह जाएगा। तब तू अपनी दुर्दशा में इस्राएलियों की समृद्धि जो मैं उन पर बरसाऊंगा ईष्‍र्या की दृष्‍टि से देखेगा। तेरे परिवार में कोई वृद्ध पुरुष कभी नहीं होगा! मैं तुम में से एक पुरुष को अपनी वेदी के सम्‍मुख से न हटाकर जीवित रखूँगा, जिससे रो-रोकर उसकी आँखें धंस जाएँ, और उसके प्राण मुरझा जाएँ। तेरे परिवार के समस्‍त सदस्‍य तलवार से मृत्‍यु के घाट उतार दिए जाएँगे। जो घटना तेरे दोनों पुत्रों, होफ्‍नी और पीनहास, के साथ घटेगी, वह तेरे लिए एक संकेत-चिह्‍न होगा। घटना यह है कि तेरे दोनों पुत्रों की मृत्‍यु एक ही दिन होगी। मैं अपने लिए एक विश्‍वसनीय पुरोहित नियुक्‍त करूँगा, जो मेरे हृदय और प्राण की इच्‍छा के अनुसार कार्य करेगा। मैं उसके लिए सुदृढ़ घर का निर्माण करूँगा। वह मेरे अभिषिक्‍त के सम्‍मुख सदा रहकर उसकी सेवा करेगा, और उसका कृपा-पात्र बनेगा।